The Making of a Global World - भूमंडलीकृत विश्व का बनना
व्यापार अधिशेष से क्या अभिप्राय है ? भारत के संदर्भ में व्यापार संतुलन हमेशा ब्रिटेन के लिए अनुकूल क्यों था ?
Type: DESCRIPTIVE • Marks: 2
व्यापार अधिशेष से क्या अभिप्राय है ? भारत के संदर्भ में व्यापार संतुलन हमेशा ब्रिटेन के लिए अनुकूल क्यों था ?
Answer
व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) वह स्थिति है जब किसी देश का कुल निर्यात मूल्य उसके कुल आयात मूल्य से अधिक होता है। 19वीं सदी में भारत-ब्रिटेन व्यापार हमेशा ब्रिटेन के लिए अनुकूल था क्योंकि भारत से कच्चे माल (कपास, अफीम) के कम मूल्यवान निर्यात के मुकाबले ब्रिटेन से महंगे मशीन-निर्मित उत्पादों का आयात बहुत अधिक था। भारत-ब्रिटेन व्यापार संतुलन ब्रिटेन के अनुकूल होने के कारण:औद्योगिक वस्तुओं का प्रभुत्व: ब्रिटिश मिलों में बने तैयार कपड़े और अन्य सामानों ने भारतीय बाजारों को पाट दिया था, जबकि भारत केवल कच्चे माल का निर्यातक बनकर रह गया।अफीम और कच्चे माल का निर्यात: भारत से अफीम, कपास और नील का निर्यात होता था, लेकिन ब्रिटिश नीतियां ऐसी थीं कि भारत से होने वाला निर्यात ब्रिटिश आयात की तुलना में बहुत कम मूल्य का होता था।होम चार्जेस (घरेलू खर्चे): भारत के व्यापार अधिशेष का उपयोग ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन, पेंशन और निजी प्रेषण (घर भेजे जाने वाले पैसे) के रूप में भारत से बाहर ले जाने के लिए किया जाता था।बहुपक्षीय निपटान प्रणाली: ब्रिटेन ने भारत के साथ अपने अधिशेष का उपयोग अन्य देशों (जैसे अमेरिका) के साथ अपने व्यापारिक घाटे को पूरा करने के लिए किया। संक्षेप में, यह भारत का आर्थिक शोषण था, जहाँ भारत अपने से हुए व्यापारिक लाभ को भी ब्रिटेन के विकास में खो देता था।
Explanation
व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) वह स्थिति है जब किसी देश का कुल निर्यात मूल्य उसके कुल आयात मूल्य से अधिक होता है। 19वीं सदी में भारत-ब्रिटेन व्यापार हमेशा ब्रिटेन के लिए अनुकूल था क्योंकि भारत से कच्चे माल (कपास, अफीम) के कम मूल्यवान निर्यात के मुकाबले ब्रिटेन से महंगे मशीन-निर्मित उत्पादों का आयात बहुत अधिक था। भारत-ब्रिटेन व्यापार संतुलन ब्रिटेन के अनुकूल होने के कारण:औद्योगिक वस्तुओं का प्रभुत्व: ब्रिटिश मिलों में बने तैयार कपड़े और अन्य सामानों ने भारतीय बाजारों को पाट दिया था, जबकि भारत केवल कच्चे माल का निर्यातक बनकर रह गया।अफीम और कच्चे माल का निर्यात: भारत से अफीम, कपास और नील का निर्यात होता था, लेकिन ब्रिटिश नीतियां ऐसी थीं कि भारत से होने वाला निर्यात ब्रिटिश आयात की तुलना में बहुत कम मूल्य का होता था।होम चार्जेस (घरेलू खर्चे): भारत के व्यापार अधिशेष का उपयोग ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन, पेंशन और निजी प्रेषण (घर भेजे जाने वाले पैसे) के रूप में भारत से बाहर ले जाने के लिए किया जाता था।बहुपक्षीय निपटान प्रणाली: ब्रिटेन ने भारत के साथ अपने अधिशेष का उपयोग अन्य देशों (जैसे अमेरिका) के साथ अपने व्यापारिक घाटे को पूरा करने के लिए किया। संक्षेप में, यह भारत का आर्थिक शोषण था, जहाँ भारत अपने से हुए व्यापारिक लाभ को भी ब्रिटेन के विकास में खो देता था।
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